उपहार म दी सीख

एक सैर म एक राजो रै छो। वांको राजो बडो द्‍या हाळो छो। अर ऊ घणो लखणहाळो बी छो। वांका लोगदणी ई ऊ अपणी ओलाद क नाइ समझअ छो। अर लोगदणी बी ऊंकैतांई बाप की बर्याबर मान छा। पण ऊका सैर म एक गरीब मनख रै छो। ज्यो ऊंकी बराई करै छो। पण फेर बी रा

ऊंचा दरजा को मनख

एक टैम की बात छै। गोतम बुद न वांका चेला क लारां एक गांऊ म डेरा लगाया। जस्यांई चेला गांऊ क मलाडी फरबा ग्या तो। ऊ गांऊ का मनख्यां न वासूं आछी

आळसी मनख

एक टैम की बात छै। एक दन गांऊ म मेळो लागर्यो छो। ऊ मेळा म गांऊ का घणा मनख भेळा होया। वान एक दन गांऊ म हेलो पड़वायो। भाई जो गांऊ म सबसूं जादा आळसी होवै। उनै आज इनाम द्‍यो जावगो। सन्दा आळसी मनख्‍यां सूं म्हाक

अंदेरो अर उजाळो

एक गरुजी की टापरी म एक नयो चेलो आयो। ऊ गरगड्‍या लेबा क तांई वांकी टापरी म रैबा लागग्यो। एक दन बाबाजी न चेला सूं खी। म्हूं थोड़ा घणा दना क क्ले पला गांऊ म जार्यो छूं। थू यांई रीजे अर आपणी टापरी की रूकाळी कर