एक गांऊ म एक पटैल जी रै छा। वांकै च्यार बेटा छा। च्यांरू को ब्याव होर्यो छो। एक दन पटैल जी न की जावो ब्वांवो आपणा माळ म जावो। अर चणा न नीन्दर आवो। च्यारु ब्वां माळ म चलगी। ब्वां न सोची ये चणा तो काटणी बी आपण न ई पड़ैगा। तो आपण तो अबार सूं ई काटबा लाग जावां। सब क आसै आगी। व्ह काल सूं ई चणा काटबा लागग्या। अस्यां करता-करता वानै सन्दा चणा काट घाल्या। एक दन पटैल जी न सोंची ल देखा माळ तांई फर्यावां। चणा कतना क बडा होया। पटैल जी माळ म चलग्या। पटैल जी न माळ देख्यो तो आंख्यां फाटी की फाटी रैगी। पटैल जी क रोस आग्यो। ब्वां म गाळ्यां खाडता ई ज्याग म आग्या। अर वांका बेटा बलाया। अर वासूं खी या राण्डा न छोड्यावो यांका घरानै। तीन बेटा तो धर चाल्या अर छोड्याया वांका घरानै। पण छोटी क कोइ बी कोइनै छो। अब ऊंई कटी छोडै। पण पटैल को हुकम छो। जाणी तो पड़ैगो। अर ऊ ऊंकी लुगाई लेर चलग्यो। गेला म एक राड़ी म होर खड्यो तो वांई रात पड़गी। लोग न खी लुगाइ सूं रात तो यांइ खाडणी पड़ैगी अर यांई सोणी पड़ैगो। अस्यां करैर वो दोनी सोग्या। पण रात म ऊंको लोग ऊंई एकली छोडर चलग्यो। वा भापडी़ तड़क उठी तो ऊइ कोइ न्ह दिख्यो। वा तो डरगी अर रोबा लागगी। अर म्हूं क्हां जांऊ एकली। म्हूं तो गेला बी न जाणूं। अस्यां कैती जावै अर रोती जावै। थोड़ी देर बाद ऊंई डर लागबा लाग्यो वा एक गुपा म गुसगी। वां गुपा छी बान्दरा की उनै वां बड़्या रोटी स्याग बणार पाणी भरैर अर नमटर बैठगी। थोड़ी देर बाद वां बान्दरी आई। बान्दरी कैती आई धापाऊं-धापाऊं मनख जसी बास आवै। जि पैली वा लुगाई बारै खडी म्हूं छूंरी माई थारी धरम की बेटी। बान्दरी घणी खुस होई। आरी म्हारी धरम कि बेटी। गळै मलगी। थोड़ी देर पाछै बान्दरो आयो तो उसूं बी अस्यांई खी तो उनै बी वा अपणाली। अब ऊंटी पटैल जी का माळ म चणा का रूंकड़ा प हिरा मोरां पदा होया। तो पटैल जी खुस होग्या। अर खबा लाग्या म्हारी ब्वां तो लक्सम्यां छी जावो वांई लेर आवो। तीनो बेटा तो चलग्या अर छोटो क्हां जावै भापड़ो। पण ग्यो ज्यां छोडी छी वांई जार बैठग्यो। थोड़ी देर बाद वा लुगाइ पाणी भरबा गी तो ऊंई ऊंको लोग मल्यो। उनै की थां यां कांई करर्या छै। लोग न की थंई लेबा आयो छूं। भाईजी न बलाइ छै वा नटगी पाछा चल जावो म्हूं तो न जांऊ। न्ह तो म्हारी मांई आ जावगी तो थांई खाज्यागी । वो काणै कसी इकी मांई आगी चाल न तो द्यूंगु दो च्यार। अस्यां कैता ईं ऊंकी मांई आगी अर कैती ई आई धापाऊं-धापाऊं मनख जसी बास आवै– अस्यां कैतांई उनै ऊंको लोग गुसाड़द्यो जस्यांई बान्दरी भीतर आताई लोग बोल्यो म्हूं छूंरी माई थारो धरम को ज्वांई अस्यां कैता ई आवोजी म्हारा ज्वांई जी। कस्यां आया। लोग न की ई लेबा आयो छूं। खरी बेटी जावगी क। आं माइ जाणी पड़ैगो । चाल ठीक छै। पण जब बी म्हारी याद आव तो आजे, बेठी। ठीक छै मांई। अस्यां कैर वा हटवाड़ा म गी अर न्वा-न्वा लता, रासपीस, मठाया, अस्यां की मनमान चीजां लेर आई अर ज्वांई जी बी नया लता परार खनाया बेटी क लारां मनमान पीसा गणोगांठो बांदद्यो अर मठायां लता देद्या अर ऊटी तो भाबड़ी तीनो ब्वां तो एक साड़ी सूं ई बीदा कर दी। जी क कांई कोइनै छो वा घणो सारो धन डायजो लेर आयी। पटैल जी बी खुस होग्या।
- तरक माण्डो