एक बार एक पटैल जी छा। पटैल जी न वांकी छोरी को ब्याव माण्ड्यो। अब ब्याव माण्डताई कांई कै छै। छोरा का आडी सूं जान आगी। लोग-बाग जान को स्वागत करबा क तांई बड्या नमट्या पावणा पीर आग्या। लोग-बाग जीम जामर नमटग्या। अब फेरा की ठाम प नाया की बा न लिपा-पोती करी पण उनै एक पोल म हात सूं लिप्यो-पोत्यो करबो भूलगी। अर ऊ ठाम प फेरा पड़बो सरू होग्यो। तो पण्डत जी न कांई खी जजमान घी लाओ। तो पली गार का गढ्या म घी रै छो। लाडी का भाईजी पूरो गढ्यो लेर पण्डतजी क गोडै ल्यांया। अर पण्डत जी सूं खी थांक हवन म छावै जतनो घी खाडल्यो अर गढ्यो पाछो मई दे द्यो। क ठीक छै जजमान साब। अब ब्याव को घर छो। लाडी का भाईजी तो भूलग्या गढ्यो लेबो। उटी पण्डतजी न सोंची क येतो भूल भालग्या आपण ई घी का गढ्या ई देर इन तो आपण घरां ले चालैंगा। तो पण्डतजी न अटी-ऊटी मनख देखर ऊ गढ्यो छाणा का परावण्डा म मलद्यो। पण नाया की बाई न पण्डजी की तोल राखी। तो नाया की बाई न सोची या तो गजब होगी। पण्डतजी सन्दो घी खावगा क। आपण बी आदो घी लेंगा। न तो आपण बी पटैल जी सूं कदेंगा। अर अटी पण्डतजी कै छै। बांईरावो गाळ्या-वाळ्या गावो। फेरा पड़बा को टैम होग्यो। तो बाईरां खबा लागी क म्हांई तो गाळ्या बी गाणी नाव्ह। अर म्हांई तो गीत गाण्या बी नाव। तो नाया की बाई सूं पण्डतजी कै छै। अरि नायां की बाई तूई गादै। तो नाया की बाई कांई गावै छै। गीत सूंणज्यो -घी को तो गढ्यो पण्डतजी परावण्डा म धरियो आदी -आदी करैर खाओ जी पण्डतजी। या कैतांई पण्डतजी पतो पड़्यायो अर थारीका ई नाया की बाई कतांई तोल पड़्यायो घी का गड़ल्या की तो पण्डत जी कांई कै छै। अरि छानी रै चुप कर थारै म्हार बीच म आदी पांती होवगी ओम नम: स्वा। तो नायां की बाई कांई कै छै। एक तो पण्डतजी आदी पाती दे काणअ न दे। तो फेर नाया की बाई कांई गावै छै- बात करो तो पण्डत जी सांची सांची किज्यो-2 नतो थांक म्हांकै बीच म बगड़ जावैगी बात पण्डतजी। तो पण्डतजी न सोची नाया की बाई क पाप आर्यो छै। तो पण्डतजी कांई कै छै। अरी म्हन कैदी जे असल छै ई कोई बी न टाळ सक ओम नम: स्वा। तो अस्यां फेरा पड़ग्या लाडा-लाडी सब ग्या। ब्याव नमटग्यो अर पण्डतजी अर नाया की बाई न घी की पांती पाड़ली। अर सन्दा अपणा अपणा घरां न चलग्या।
- तरक माण्डो