एक राजो रात म घणी नीन्‍द म ऊंका मैल म सोर्यो छो। उनै सपणा म देख्‍यो की ऊंका राज मैल मसूं एक देवतो खडैर जार्यो छो। ऊंकै पाछै सूं तीन देव्या बी जारी छी। सपणा म राजा न देवता सूं पूंछी थां कुण छै। अर थांक पाछै ये तीन देव्यां कुण छै। अर थां यांसूं क्‍हां जार्या छै। अर यांसूं जाबा को कांई कारण छै। देवता न खी-‍म्हारो नाऊ सूंसंस्‍कार छै। बड़्‍या संसकार होवै तो बड़्‍या अक्‍कल आवै छै। ज्‍यां भोग अर पाप जादा बड जावै छै वां म्हूं न्ह रूं। अर ये तीन देव्यां बी म्हारै लारां ई जाव छै। यां तीना को नाऊ छै लक्‍समी, कीरति, बुद्‍दी। राजा की एकदम आंख्यां खुली। राजा न बच्यार कर्यो क आपणा राज्‍य म पाप अर भोग बड़तो ई जार्यो छै। लोगां म धरम को भाव (भावना) घटतो ई जार्यो छै। भोग स्वारथ बड़र्यो छो। तो अस्यां कि दसा म तीनो देव्यां न जाणो ई छो। राजा न अपणा दरबार म काम करबाळा न नया-नया काम दे द्‍या। जीसूं परान्त म पाप न्ह बडै। दूसरै दन राजा का सपणा म च्यारो लोग पाछा आग्या। ज्यां धरम रै छै। वां सब रै छै।