पांच सो को खांणो बणायो, हजार क तांईं द्या नूंता।
जीमबा म भगदड़ माचगी, मनख दणी हेरै जूता॥
आगो बाळ अस्यो जीमबो, खामी दअ अतना नूंता।
च्यार पड़्यां तो खाई कोइनै, च्यार सो का गमग्या जूता॥
बायरां तो चपलां प बैठगी, वांका दन तो छा सूंळा।
चपलां तो बचगी भाया पंण, घरां न जार बाळ्या चूला॥
आखै गेलै बातां चाली, म्हांकै तो वै भूखा ई रैग्या
स्याग-पड़ी बी बीतगी भाया, सेणांजी कान म ईं खैग्या।
कांईं आंण पड़ी जगत नूंतबा की, खामी करी अतनी ऊंची नाक।
जतनी गोदड़ी उतनां पांव पसारता, काळज्या की होगी दो फांक।
बणी-बणाई बगाड़ दी सन्दी, पांच मनक्यां म कटगी नाक।
कांईं बच्यारी दीन्यां का बाप, केसा म तो लेता झांक।
नाक ऊंची करबा का चक्कर म, घर करद्यो सन्दो बदनाम।
जतनीं गोदड़ी उतना पांव पसारां, सरे सीजे जस्यो करां काम।
लोग बाग भूखा नअ जावै घर सूं, भलांईं कम करां पकवांन।
थांनअ सुंणाई एक बार की दास्तांन, करोनो नअ कर्यो इंतजाम।।
- तरक माण्डो