एक बार कड़ाका की ठण्ड म एक गरीब मनख ऊबाणा पगा सूं डील का लत्ता पैन्या होयो, कोइ गेला प कुसी सूं गातो जार्यो छो, गेला म ऊंको मलाण एक पीसा हाळो मनख सूं होइ। ऊ घोड़ा प बैठ्यो होयो छो। ऊका डील प कोट, लबादा, टोपी छी। पगा म उनै घाडा चमड़ा को जूता पैण राख्या छा। गरीब ई कड़कड़ाती ठण्ड म घणो खुस अर सादा छो। पण पीसाहाळा क गोडै सब होबा क बाऊजूद बी ठण्ड की मार्यां कापर्यो छो। उनै गरीब अतनो खुस देख्यो तो हेरत म पड़र बोल्यो- “ कांई बात छै भाई? तू, ई कड़ाका की ठण्ड म बना लत्ता क अटी-ऊटी घूमर्यो छै। थारैताइ ठण्ड न्ह लागै क? अतनी ठण्ड कस्या झेलल्य छै?”
“ कांई होयो सरी मान “थां थाका मुण्डा प कस्यां ठण्ड न झेल ल्य छै।
“ म्हारै मुण्डा प ठण्ड न झेलबा की लत पड़गी, पीसा हाळा मनख क तांई जवाब द्यो।
“ अर फेर म्हारो डील बी अस्यो होग्यो, थारै मुण्डा क बर्याबर म्हारो सन्दो डील बी आदी होग्यो।
सिक्सा - जद आपण दिक्कता सूं आदी होज्यावां छां, उनै आसानी सूं सैन करल्यां छां।
- तरक माण्डो