एक बार उकाब न एक खड़गोस्या को पीछो कर्यो। खड़गोस आडो टेडो भाग्यो। कस्या न कस्या झाड़्या म जार छपग्यो। अर ऊंकी ज्यान बचगी। ऊंको काळज्यो हालतांई धड़कर्यो छो। ऊ हालतो संभळ ई र्यो छो। जद उनै एक गोरया चड़ी कतांई सुण्यो, खड़गोस! अतनो डर क्यूं छै। उकाब सूं अतनो घबराबा की कांई बात छै। म्हनै देखो म्हूं कतनी छोटी छूं, फेर बी उकाब सूं न डरूं, अर तूं अतनो बडो होर बी उकाब सूं डरै छै। बड़ी सरम की बात छै। उकाब हाल बी खड़गोस की तलास करर्यो छो। पण खड़गोस झाड़्या क बीचा म छप्यो छो। जिसूं उ उनै न्ह देक पार्यो छो। पण उनै गोरया
चड़ी को डाळ प बैठ्यो अर चीं चीं करती देख ली छी। गोरया चड़ी हालतो बढ़-चढर बातां कर री छी।
क उकाब आन्धी की नाइ ऊंपै झपट्यो अर ताकत सूं चूंगळ म दबार उडग्यो। ‘मुरक म्हारै तांई सला दे छी अर अपणी चन्ता कोइनै छी’ खड़गोस न बच्यार कर्यो क सइ ठाम प दोड़ पड़्यो।
सिक्सा - अपणो बचाव न करैर दूसरा क तांई सला देबाळा यूंई मरै छै।
- तरक माण्डो