भैरूजी म्हारी अरज
ये म्हारी अरज सुणो न माराज रे भैरूजी म्हारी अरज।
घणा ढोक्या देवी-देवता, थानअ खअ यू बताऊं॥
लालो गोदि मअ देख्यो नअ माराज रे।
भैरूजी थांका गुण गांऊ…॥
पेदल उबाणी ढोकां देती आई थारअ द्वार।
अरज लगाऊं सुणज्यो, म्हारी म्हूं दुखियारी नार
गांऊ ढाणी मअ करवाद्युंगी परचार रै।
भैरूजी थांका गुण गांऊ रे…………………………………………॥
परण्यो म्हारो घणो खोड़ल्यो कदी नअ सूंळो बोळ्यो।
खाता पीता मअसूं लड़ जी कदी नअ प्यार सूं बोल्यो
म्हारी गोदी मअ देद्यो जी नन्दलाल रे।
भैरू जी थांका गुण गांऊ………………………………………………॥
सासू ससरा म्हारा म्हनअ बाजड़ खअ बतळाव जी।
जण-जण म्हारा बेरी बणग्या यानअ कुण समजावअ॥
लालो गोदी मअ खलवाद्यो माराज रे।
भैरू जी थांका गुण गाऊं………………………………………………॥
दोराण्यां म्हारी बातां जोड़ या बाजड़ छ नार
मुखड़ा पाछ यू बतळाव या छोरी बेकार
सरम लाज्यां सूं मरगी रे माराज रे
भैरू थारां गुण गांऊ……………………………………………………….॥
- तरक माण्डो